शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

जेकरे खातिर अलगे भईली उही मिलल बखरे

ऐसी बानी बोलिए ,छूटते झगडा होय.....सुनही में ठहाकेदार नहीं हौ बल्कि एके देखे के होय त चल जा अस्सी। मशहूर चाय क एक दुकान जहाँ एक से बढ़ के एक उज्जर चरित्र क दर्शन होजाई। भांग क गोला लेहले पांडे जी अरे का गुरू एक दम गुलरी क फूल हो गईल बाड़ा ,कहा रहला रजा इतना दिन बाद आवत हौआ। एक थे और पैग बने दिहे रे बचवा..... । तबले समने एक बुजुर्ग ऐलन ,आवा हो बेदान्ती जी.......... । हमरहु मन में आइल की लगत ह कोई ढेर बधार बिद्वान हौका बुढवा। उहो साथे चाय पीलन,फिर खिसक लह्लन बिना कुछ बोले ही त हम से न रही गईल त पुछली की इ कहाँ क बेदान्ती जी बाड़े गुरू। छूटते पाडे जी कहे अपने घरे क बेदान्ती जी हौऐन और कहाँ क। हम कहे का मतलब ,तब ले चायवाला टपक से बोलल अरे दादा उनकर कुल दात टूट गईल हौ एही बदे ई लोग उन्हें बेदान्ती कहेलन। हसत हसत हम्काहे अब निकल ला भाई,इही हौ ,अस्सी क मलाई.............

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