बुधवार, 10 नवंबर 2010

चला भाग चलीं गऊआं के ओर

बनारस ऐसन शहर हव जहाँ एक से बढ़ के एक कलाकार बाड़े। नेतागिरी का त इ सबसे बडवार सिद्धपीठ बाय । आज से पच्चीस साल पहिले जे इहाँ पढ़े-लिखे खातिर आइल ,उ कैसहूँ कई के इहाँ रही क पूरा कोसिस कैलस और भोले बाबा के असीस से यहीं ज रहू गईल। नोकरी-वोकरी मिल गईल त ठीकै ठीक नहीं त दलाली जिंदाबाद ,जब वो हूँ जुगाड़ न लग पावै त छूट के टाइम पर कुरता पैजामा और फिर गान्धीबबा के टोपी लगा के शुरू नेतागिरी।
लेकिन इ परिस्थिति जन्य नेतागिरी के अलावा इहाँ नेतागिरी क कई थे पाठशाला भी बा। सबसे बडवार पाठशाला रहल बी एच यूं जहाँ से छात्र्नेतवन सब बड़े आगे जात रहलन ,आजकल उहो बंद बाय। राहुल गांधी त बड़ा सहकल बाड़े लेकिन गुरु जे छात्रसंघ क शकल नाहीं देखले ऊ ओकर का उद्धार करी। पढके भाषण देवे वालन के भरोसे कब ले देश चली। इसे निक त गऊऐ रहल जहा कम से कम आफत विपत में बिना स्वार्थ के चार लोग खड़ा त हो जाने। इहाँ त साला लाशो ढोए खातिर केहू जल्दी फोन कैले पर भी न आवल चाहत ............... चला चलल जाय फिर से वोहीं। जय ग्राम्यजीवन

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