अस्सी पर एक दिन एक पुरान पढ़वाक से भेट हो गईल,उनकर चाय पीय क भी पाप कर देहली, त अब सुना उनकर देशवा तब आउर अब पर परबचन। कहे गुरू पहिलावां न पेट भर खाए के भी जुगाड़ में लोग दिन-दिन भर झूठ बोलें,लेकिन रात के ठाठ से नीद त आवे,अब साला खाए क कमीं केहू के नईखे लेकिन नीद कवनो के नाहीं आवत हौ। जे जेतना बड़ा आदमी उ ओतना बदवार रोगी। पेटभारे भर क त दवईये खाए के बा।
अवा मंगरुआ क पान खायल जाय ओहू सारे क भासन सुन लेवेके। मंगरू अ गुरुआ क पुरान संघियाना बा। उ इनसे पैसा त पाने क ना लेत,लेकिन उनकर एको करम छोड़त भी ना। लागल कहे महोदय क किस्सा की एक बार बहुत पाहिले हम लोग एक बारात में गईली। उहा भयल कि हम लोग बनावल खायल खुद जाई ,ओ समय बफर सिस्टम नहीं चालत रहल ग .....भाई। हमनी क बस दू लोग रहली ,सर सामान जब लड़की क घर वाले देवे लगलन त पूछलन कि के जाने बाड़ा जा लोग। गुरुआ भील सुरु कहे.., हम हई,हमेस हौवे,बाप पूत रमेस हौवे,धुरई हौवेधुरेंधर हौवे ,बाप पूत धर्मेद्र हौवे,जीती हौवे जितेन्दर हौवेबाप-पूत पात्बर्धन हौवे,मुअला हौ लोढ्वा हौ साथै दत खोडवा हौ .....हम कहे बस कर मरदे इतना में हो जाई ,बीसन जाने क सिद्ध लेके हमने दुसरे में खईली ,कुल सामान बेच के दू दिन मस्ती। का गुरू। गुरुआ क पान अब खतम हो गईल लहल कहलस कि पान खियाव्त बोलीं,पान मिलते चेहरा खिलल कहलस कि कम से कम सुतत त रहली। अब त निदियो खातिर गाना गावे के होई ,कि अईहो रे निदिया निदर बन से।
बुधवार, 24 नवंबर 2010
रविवार, 21 नवंबर 2010
अपने खाय त मलाई,दूसर खाय त कोलेस्ट्राल
बड़का त बोलती रहलन,सब सुनते रहल कान में कडुआ तेल डाल-डाल के अब वरुणो गाँधी नसीहत देवे लगलन कि,देश के हर नौजवान के साल भर खातिन सेना में कयेके चाही। एसे सेवाभाव जागेला। अपने कौने सेना से लवट के आयल बड़ा ये भाई। खानदानी गुण तोहरहू अन्दर जनमते आवे लागल। किसानन क लडिका त मूरख बटले बाड़े। उ बेचारे देश क पेटवो भरें आउर त आउर सेनों में मरे खातिन जमल रहे,तू हेलीकाप्टर प चढ़के मलाई काटा। औते आवत गंगा एक्सप्रेस क लड़ाई क नाम लेके जनता क नेता बनी गईलन,सीधी सधी जनता भी वरुण गुड खाय के वह-वह कर देहलन त जयजयकार करे लागल,पजरे ओकरे परोसिया क लडिका एक रोरी गुड बदे कुहुक-कुहुक के घंटन रोवला,ओके अगर खियावतैं त बढ़र भैले पर वरुण से ढेर काम क होत उनकरे खातिन।
देशवे ऐसन बा अपने स मलाई खैहन औ जनता के सम्झैहन कि एसे कोलेस्ट्राल बढ़ेला,जनता जिंदाबाद चिल्लाके उनकर बात मानी। अपने सितारा वाले होटल के नीचे रुकिहैन नाही ,जनता के मदी क ऐसन गुणगान करिहन कि उ ओसे उप्पर सोची न पावे। अगर इतना गुण होखे त भारत में राजनीती क सपना देखा ,नहीं त भगवन से मनवा कि अगले जनम में बड़का नेतवन के घरे जनम होखे जेसे तोहरो आत्मा बुताय जाये।
देशवे ऐसन बा अपने स मलाई खैहन औ जनता के सम्झैहन कि एसे कोलेस्ट्राल बढ़ेला,जनता जिंदाबाद चिल्लाके उनकर बात मानी। अपने सितारा वाले होटल के नीचे रुकिहैन नाही ,जनता के मदी क ऐसन गुणगान करिहन कि उ ओसे उप्पर सोची न पावे। अगर इतना गुण होखे त भारत में राजनीती क सपना देखा ,नहीं त भगवन से मनवा कि अगले जनम में बड़का नेतवन के घरे जनम होखे जेसे तोहरो आत्मा बुताय जाये।
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
बीस सालों से लूट-खसोट का अड्डा बना बीएचयू
विश्व की शैक्षणिक राजधानी और धरोहर के रूप में विख्यात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बीसों सालों से लूट -खसोट का अड्डा बन कर रह गया है। सन १९४६ में महामना के तिरोधान के बाद लगभग दसो साल तक तो उनके खडाऊं की आवाज यहाँ के करता धर्ता को सपने में भी सुनाई पड़ती थी ।लिहाजा उनके होश उड़े रहते थे और गलत करने की उनकी हिम्मत भी नहीं हो पाती थी। उसके बाद साथ के दशक से छात्र राजनीत के तेवर ने लोगों को ईमानदार बने रहने पर मजबूर कर रखा। विश्वविद्यालय प्रशासन की आख की किरकिरी तो सदैव से छात्र संघ रहा लेकिन उनकी एक न चलती थी। लेकिन कालांतर में,एक के बाद एक धृष्ट लोगों का पदार्पण होता रहा और, छात्रों का मंच गायब करने में ये लोग सफल रहे।
अब आज की दशा ये है की पूर्वांचल के एम्स के रूप में जाना जानेवाला यहाँ का अस्पताल भी इनके भ्रष्टाचार के आगोश में है। इमरजेंसी सेवाएँ एक दम से ठप कर दी गयी है,डाक्टर के कहने पर ही पुर्जा बनता है,अब ये कहे भी क्यों लिहाजा,सैट सौ से घाट कर इमरजेंसी के बिकनेवाले पर्चे की संख्या २०० हो गयी। इस तीन लाख रूपये के घटे का जिम्मेदार और कितने के मौत और कष्ट का जिम्मेदार कौन होगा । यह एक बड़ा प्रश्न है। ये महोदय लोग ये भी भूल गए की यह संस्था सरकारी खजाने से नहीं बल्कि मालवीय जी के कटोरे से बनी हुई है,जिसमे गरीब -अमीर सबका बरारर योगदान रहा है।
इन्ही सब कलीयों के खुलने के भय से ये आज चाहते हैं की छात्रसंघ न हो,अन्यथा इनको खून बेचकर ये कर्जे चुकाने हो जायेंगे।
अब आज की दशा ये है की पूर्वांचल के एम्स के रूप में जाना जानेवाला यहाँ का अस्पताल भी इनके भ्रष्टाचार के आगोश में है। इमरजेंसी सेवाएँ एक दम से ठप कर दी गयी है,डाक्टर के कहने पर ही पुर्जा बनता है,अब ये कहे भी क्यों लिहाजा,सैट सौ से घाट कर इमरजेंसी के बिकनेवाले पर्चे की संख्या २०० हो गयी। इस तीन लाख रूपये के घटे का जिम्मेदार और कितने के मौत और कष्ट का जिम्मेदार कौन होगा । यह एक बड़ा प्रश्न है। ये महोदय लोग ये भी भूल गए की यह संस्था सरकारी खजाने से नहीं बल्कि मालवीय जी के कटोरे से बनी हुई है,जिसमे गरीब -अमीर सबका बरारर योगदान रहा है।
इन्ही सब कलीयों के खुलने के भय से ये आज चाहते हैं की छात्रसंघ न हो,अन्यथा इनको खून बेचकर ये कर्जे चुकाने हो जायेंगे।
रविवार, 14 नवंबर 2010
संघ,सुदर्शन ,सोनियां
इस समय देश में कोई राजनैतिक मुद्दा राजनीतिज्ञों की नजर में नहीं है। तो इनको मुद्दा पैदा करना पड़ता है। तीन भारतीय स इस समय चर्चा के विषय बने हुए हैं। पहला संघ यानि डॉ हेडगेवार की अनूठी पहल एक तथाकथित गैर राजनैतिक सन्गठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ,दूसरा सुदर्शन जी जो पूर्वमें संघ के मुखिया रहे हैं। तीसरी सोनियां जी जो कांग्रेस अध्यक्ष और संप्रंग सरकार मुखिया रही हैं। सुदर्शन जी ने आनन् फानन में पता नहीं क्या सोचा की सोनियां जी के बारे में अनुचित टिपण्णी कर डाले। यद्यपि यह हर हाल में अनुचित है। लेकिन मानों कांग्रेसियों को ये हादसा पहले से पता था जो इसके लिए कमर बाढ़ लड़ने के लिए तैयार है। अरे भाई हो गया बुड्ढ़े पे तरस खाईये,राजनीति चमकाने का इससे भी बड़ा अवसर मिलता रहेगा। यद्यपि संघ की भूमिका को भी बहुत साफगोई से विचार करने पर मिलेगा की की यदि यह अपने को गैर राजनैतिक संगठन कहता है तो कभी-कभी भाजपा को छोड़ दूसरी पार्टी को भी सराहा करो भाई ओ भी गलती से ही सही, सही काम करते हैं ऐसा नहीं है सबके उद्देश्य गंदे ही हैं। भाजपा या किसी एक दल का मुख पात्र बनना तो शायद आपके संस्थापक प्रमुख रहे डॉ हेडगेवार साहब के वैचारिक भूगोल में रहा नहीं होगा।
सोनिया जी की पार्टी से उनकी सरकार से किसी का सरोकार हो या न हो लेकी सुदर्शन जी की टिपण्णी पर तो सारा देश चिल्ला रहा है की ये बहुत गलत हुआ ,अब क्या ..चाम की जीभ लाम जब चली ही गयी तो............
अतः छोडिये विरोध बुजुर्गों की गलतियाँ गलतियाँ नहीं होती,और ख़ास कर ऐसे हालत में जब उसके बच्चे ही कह रहे हों की उनके खिलाफ मुकदमा होना चाहिए।
सोनिया जी की पार्टी से उनकी सरकार से किसी का सरोकार हो या न हो लेकी सुदर्शन जी की टिपण्णी पर तो सारा देश चिल्ला रहा है की ये बहुत गलत हुआ ,अब क्या ..चाम की जीभ लाम जब चली ही गयी तो............
अतः छोडिये विरोध बुजुर्गों की गलतियाँ गलतियाँ नहीं होती,और ख़ास कर ऐसे हालत में जब उसके बच्चे ही कह रहे हों की उनके खिलाफ मुकदमा होना चाहिए।
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
जेकरे खातिर अलगे भईली उही मिलल बखरे
ऐसी बानी बोलिए ,छूटते झगडा होय.....सुनही में ठहाकेदार नहीं हौ बल्कि एके देखे के होय त चल जा अस्सी। मशहूर चाय क एक दुकान जहाँ एक से बढ़ के एक उज्जर चरित्र क दर्शन होजाई। भांग क गोला लेहले पांडे जी अरे का गुरू एक दम गुलरी क फूल हो गईल बाड़ा ,कहा रहला रजा इतना दिन बाद आवत हौआ। एक थे और पैग बने दिहे रे बचवा..... । तबले समने एक बुजुर्ग ऐलन ,आवा हो बेदान्ती जी.......... । हमरहु मन में आइल की लगत ह कोई ढेर बधार बिद्वान हौका बुढवा। उहो साथे चाय पीलन,फिर खिसक लह्लन बिना कुछ बोले ही त हम से न रही गईल त पुछली की इ कहाँ क बेदान्ती जी बाड़े गुरू। छूटते पाडे जी कहे अपने घरे क बेदान्ती जी हौऐन और कहाँ क। हम कहे का मतलब ,तब ले चायवाला टपक से बोलल अरे दादा उनकर कुल दात टूट गईल हौ एही बदे ई लोग उन्हें बेदान्ती कहेलन। हसत हसत हम्काहे अब निकल ला भाई,इही हौ ,अस्सी क मलाई.............
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
नाग नागिन मर गईले गोजरवा क तिलक चढ़े
देशवे में आग लागल बा हो .बड़े जोर से चिल्लात भय जुम्मन चाचा बोलवने। का हो अरे तोहरे गऊआ से के जीतल पर्धनियाँ में। हम कहे अरे चचा जनते बाड़ा की बिना पैसा क चुनाव जीतना बड़ा मुस्किल बा। बस अब का शुरू हो गईल चच्वा अपने अंदाज में.........देखा ये ग .....जी ,नाग नागिन मर गईलन गोजरवा क तिलक चढ़े तवने हाल हौ। तोहऊँ के कई बार कहली की लखनऊ वाला चुनौवा लड़ जा ,त पैसा जोहत .हौआ न ठीकेदारी करबा न ,दलाली तोहसे होखी ना, त पैसा कहाँ से आई। मास्ट ..........से चुनाव न लड़ाई। तोहसे बढ़िया कवन बोले वाला बा हो इ टाइम लेकिन तू बड़ा की तोहके अपने ताकत क अंदाजे ना हौ। हम कहे अरे चचा ,अब तोहार जमाना नहीं रहल। फिर शुरू,अरे हमरे टाइम राजनारायण अउर कमलापति गुरू एक दुसरे से लादे चुनाव में लेकिन ,राजनारायण जीववा पंडित जी से पैसो माग ले जरूरत पडले पर। आज के तरह दुश्मनी नाही रहे। पाहिले नेतवन जनता के पैसा से चुनाव लड़त रहलन ,अब त चोरवा सब गजले बाड़े खूब लुटावत हुवे,एन्हन के साथै कोई क संवेदना थोड़े बा।तू माग के चुनाव वाला संस्कृति फिर बढ़ाव गुरू ,जान ले की जीतही के हौ......... आव ,देख डग्दर साब आवत बड़े,चला उनकर पान भिदवल जाय,नाही त साला अकेल्वें खा के चल जाई । बारे जुम्मन चचा जियावा बनारस के।
बुधवार, 10 नवंबर 2010
चला भाग चलीं गऊआं के ओर
बनारस ऐसन शहर हव जहाँ एक से बढ़ के एक कलाकार बाड़े। नेतागिरी का त इ सबसे बडवार सिद्धपीठ बाय । आज से पच्चीस साल पहिले जे इहाँ पढ़े-लिखे खातिर आइल ,उ कैसहूँ कई के इहाँ रही क पूरा कोसिस कैलस और भोले बाबा के असीस से यहीं ज रहू गईल। नोकरी-वोकरी मिल गईल त ठीकै ठीक नहीं त दलाली जिंदाबाद ,जब वो हूँ जुगाड़ न लग पावै त छूट के टाइम पर कुरता पैजामा और फिर गान्धीबबा के टोपी लगा के शुरू नेतागिरी।
लेकिन इ परिस्थिति जन्य नेतागिरी के अलावा इहाँ नेतागिरी क कई थे पाठशाला भी बा। सबसे बडवार पाठशाला रहल बी एच यूं जहाँ से छात्र्नेतवन सब बड़े आगे जात रहलन ,आजकल उहो बंद बाय। राहुल गांधी त बड़ा सहकल बाड़े लेकिन गुरु जे छात्रसंघ क शकल नाहीं देखले ऊ ओकर का उद्धार करी। पढके भाषण देवे वालन के भरोसे कब ले देश चली। इसे निक त गऊऐ रहल जहा कम से कम आफत विपत में बिना स्वार्थ के चार लोग खड़ा त हो जाने। इहाँ त साला लाशो ढोए खातिर केहू जल्दी फोन कैले पर भी न आवल चाहत ............... चला चलल जाय फिर से वोहीं। जय ग्राम्यजीवन
लेकिन इ परिस्थिति जन्य नेतागिरी के अलावा इहाँ नेतागिरी क कई थे पाठशाला भी बा। सबसे बडवार पाठशाला रहल बी एच यूं जहाँ से छात्र्नेतवन सब बड़े आगे जात रहलन ,आजकल उहो बंद बाय। राहुल गांधी त बड़ा सहकल बाड़े लेकिन गुरु जे छात्रसंघ क शकल नाहीं देखले ऊ ओकर का उद्धार करी। पढके भाषण देवे वालन के भरोसे कब ले देश चली। इसे निक त गऊऐ रहल जहा कम से कम आफत विपत में बिना स्वार्थ के चार लोग खड़ा त हो जाने। इहाँ त साला लाशो ढोए खातिर केहू जल्दी फोन कैले पर भी न आवल चाहत ............... चला चलल जाय फिर से वोहीं। जय ग्राम्यजीवन
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
सुबहे बनारस
बाबा भोले के नगरी में जे जे आइल एहीं क होके रह गईल । सबेरे-सबेरे क लुभावे वाली आवाज .........का गुरू ....अकेले-अकेले ,भिडावा-भिडावा। एहीं महेंदर वाली दुकनियां पे हई,खाई के जल्दी से आवा। इ फक्कड़ी खाली येही के लोगन में बा ये भाई फाटल गमछा पहिरले पीछे से लल्लू सरदार का गुरुआ कल ओबमवा त साला हीरो हो गईल हो ,जेके देखा वोही ,ओकरे आउर ओकरे मेहरारू के बारे में चिल्लात जात बा,का करे सरवा आइल लहल हो,बड़ा पैसा खर्चा भायल होई। इहा बनारस में सरऊ ना आइलैं नहीं त बताईत की इहवां से जाये वाले लइकन का केराया तक सरवा अपने देशवा क बढाई देहलस हो ,अउर त अउर कहला की इहाँ क लोग डरग क कारोबारी बाड़ें । ओ सार के ऐसन नंगे पाव दौरैत न की होश पैतरे हो जात। करे मनमोहन अउर सोंयाँ उनकर खुशामद ,बनारस में त सबही ओबामा हौ..............................
इ मजा ,अउर भाषाई आकर्षन ,शिवाय बनारस के कहाँ बा ये भाई। ...............................
इ मजा ,अउर भाषाई आकर्षन ,शिवाय बनारस के कहाँ बा ये भाई। ...............................
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)