गुरुवार, 17 जनवरी 2013

हमार आजा घीव खईने हमार गट्टा सूंघा
खिसियाये मकुनी साव अपने लाडले को डांटे जा रहे थे ,,साला तोहके दिमाग देना गोईठा में घी सुखवले के बरोबर हाउ।महिन्नन से रटले रहल जींस पेंट चाही ,इहे फ़टहा खरीदे गयल रहलन ह ।इ कवन फैशन की जवन जेतना फाटल उ वोतना महंग।हमने जवन काम मजबूरी में करत रहली उ आज फैशन क नाम पाय गईल ,हमार मजबूरी बेचल जात बा,सबके खूब पसंदों आवत हाउ।लड़का मंद मंद मुस्करा रहा था।बाप की बेवकूफी भरी बातों  पर।
तबले हुकारी  भरे बदे छुन्नू महराज हाजिर थे।का सबेरे सबेरे कंठ फाड़त  हवा  इ साला स घीव बेच के खटाई खाए वाला हवन ,चला हमने फाटला पहिर के घीव खइली ,इ न घीव खात हवे न नए पहिर पावत हवे,और त और का पढ़ल का अपढ्ल सब फतःवे पहिरे में फसल हवे ,सबके मूरख बनवले हुवां ।हां एक बात हाउ की सब ललकारैन की हमार आजा घीव खेने हमार गट्टा  सूंघा।

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