गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

 तहलका को दिए गए एक  साक्षात्कार में महाराष्ट्र के मुख्मंत्री पृथ्वीराज  चौहाण ने बालासाहब ठाकरे को  सम्मान देने के सवाल पर सफाई पेश करते  हुए कहा  कि  एक कलाकार होने के नाते ठाकरे साहब को राजकीय सम्मान दिया गया   ।यद्यपि इस मरने के बाद के सम्मान में मेरी कोई दिलचश्पी नहीं है ,लेकिन एक बचकाना सवाल मन में आया की मकबूल फ़िदा हुसैन से बड़े कलाकार तो ठाकरे साहब कत्तई नहीं थे ,लेकिन उनको  कलाकारी का कितना बड़ा ईनाम दिया इस देश के नीति नियंताओं ने ये जग जाहिर है।हा एक कमी थी की क्षेत्रीयता का उनका दायरा नहीं था ,इसलिए वो किसी के नाथ नहीं थे,आसूओं  के काफिले   नहीं उठ पाए ,,ऐसे कितने कलाकारों को मिला सम्मान  लोग बताये,,,शिवाय ,,,,, 
                                                                छक्कों का जलवा

ये छक्के भी जीना हराम कर दिए हैं,जहाँ भी देखिये क्या  बुड्ढ़े  क्या जवान सब छक्के में परेशां हैं।इन छक्कों के चक्कर में काम धाम छोड़ कर किसी भी सरकारी गैर सरकारी कार्यालय में लोग हाथ पे हाथ रखे निहारे जा रहे हैं,छक्को को।कुछ दिन पहले एक पुरनिये नेता जी से बात हो रही थी ,तो दुत्कार भरा जवाब एक साथी के अंग्रेजी के सवाल पर देते हुए उन्होंने कहा ,मेरी अंग्रेजी कमजोर है कारन ,जिस समय आप लोग छक्को को देख थपोड़ी  बजा रहे थे तब हम अंग्रजी हटाओ का नारा लगा रहे थे।वो भी छक्कों के आगे लाचार दिखे,,इसी अंदाज में मैं  उनको भीष्म कह डाला और वो नाराज चल रहे हैं।
कभी बचपन में बात बात में छक्के छुड़ाने की बात डरा जाती थी।आज इन डर लग रहा है नई पीढी गेद और बल्ले के इन छक्कों के चक्कर में कही छक्का ही न मार जाय,,,,,

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

पतोहिया बलबा मचाय देहलस



सुबह सुबह रामनाम गुरु नीम का दातून हिलाते ,,,,का हो तूफानी चाचा ,अरे पतोहिया त बालबा मचाय देहलस ,,,तोहू कहले न मानेल्या ,,हमेशा पतोही के पीछे परल रहेला।सबेरवे मुहे में डाल के हिलावत हवा ,बोले से पाहिले सोचेला न की का कहत हई ,,,तूफानी चचा चापे ,,रामनाम गुरु माहौल ख़राब होता देख,,,देखा चाचा तू दूसर मतलब निकाल  लेहला ,,हम कहल चाहत  रहली की ,,आज  कल ढेर पतोही से झगरा रगरा  मत फाना नहीं त मिसिर जी क हाल होई ....तूफानी चचा क परा गरम,,,इ कौने मिसिर जी के कुद्व्ले सबेरे सबेरे भाय ,,,समाचार वोमाचार पढ़ल करा मिसिर जी क पतोहिया ,डिम्पलवा बम्बई से बम्बैया अंदाज में आयल बाट़े .....ससुरा सोचलस की इह दुसर बियाह रचे के आनंद लेब के खोज पायी ,,,लेकिन आज कल क लईकी  बाप रे .बाप ,,,,रामनाम गुरु चालू,,,तूफानी चचा भी तार से जुड़ गए ,,,हा यार हमहू कत्तो सुनाली का मामला हाउ,,
                अब रामनाम गुरु का असाल पर्बचन शुरू हुआ,,कहे की इ राते रात हीरोईन बन गिल चचा ,,,मेहरारुन क त  हर जगहे समर्थक मिल जाने,,इ कुल गौवन क एके हाल हाउ,,तूफानी चचा टपके अब तू केकर बुराई कायल चाहत हवा,,,बुराई  नहीं निचोड़ जवन  समझली वू दू ठे  बा ,,,ऐसन करे में अब सबकर फ़ाटी ,,,दुसर बात एहिमे भीडिया आपन पुरनकी दुश्मनी भी निकल लेले।।।कुछो हो पतोहिया बालबा मचवलस न ...एक थे नजीर बनल न ....अबहीं देखा अब केतना सुतल डिम्पल सडकी प जियाब मोहल करिहे,,,तू सही कहत हवे गुरुआ मेहरारुन के चक्कर में न पड़े तबे ठीक।।।।।।


रविवार, 1 जुलाई 2012

बड बडवा बैठल रहे गोड कहे कथा

रामनाम गुरु चालू थे कल्लू मिया हाथ में केतली लिए उनकी धारा प्रवाह भाषण में लीन थे। रामनाम गुरु अपने में विरले प्रजाति के हैं,उनको सारी बाते अलगे खटकती हैं। कहे,,इक बात न समझ में आवत हौ यार इ परधानमंत्री क दूत पहुचल माथा पटकल बड़का बाबा कहने की तीन महिना क मोहलत भी मिलल बा उनकी तरफ से ,फिर इ छोटका बाबा फिर काहे का राष्ट्व्यापी आन्दोलन चिल्लात हवें । कल्लू मिया बोले,गुरु आज फिर तोहके गंगा क भूत सवार बा,काहे बौरायल हवा कुल धान एके पसेरी ना होत। गुरु चिल्लाये जा रहे थे सुना ये कल्लू आपन केतली सम्हारा तोहरे बस क इ कुल बात ना हौ,हमारे समझ में ये बड़े इ ना आवत हौ की बड बडवा बैठल रहे गोड कहे कथा..........

गुरुवार, 28 जून 2012

छोटवार मुंह बडवार बात

सुबहे सुबह कल्लू मियां अपने चेलवा पे गरम थे ,साला पढ़ल न लिखल घर जवंपुर। तू जवंपुर क होई नाही सकते,एतना बडवार मूरख इहाँ जनमी न सकत ,साला एक त करेला ऊपर से नीम चढ़ल। तब तक पुरवा खाली करते हुए एक ग्राहक बड़ी हिम्मत जुटाते हुए पूछा चचा इ करेला नीम चढ़ल से एकर का मतलब ,,चचा शुरू इ डोभी हौ एकर आपन इतिहास हौ,इहा खाली बुद्धिमान रहेलन ,इ मूरख लईका कहा से सपर पाई इ माहोल में ,जवंपुरी समझ के रखले रहली लेकिन इ हव ना। तब तक कल्लू मियां की दिव्य दृष्टि मेरे ऊपर पड़ती है,का हो जवंपुरिया बनारसी कब शरीर आईल ह। मै बोला चचा बस आपके यहाँ ही चरण पड़ रहा है।अरे त बतावा आजकल अख़बार में बनारस वाले पेज पर खाली गेरुआ ही छौले बा हो। चचा शुरू कहो इ तपस्या त सुनले रहली इ ससुरी संकेतिक तपस्या कवन नयी बला इजाद कैलन बाबा लोग। हम कहे चचा वह गंगा अभियान पर संत लोग लड़ाई लड़ रहे हैं,सबके अपने अपने तौर तरीके हैं। तब तक पीछे से पगरी खोलते रामनाम गुरु साइकिल से उतरे चिल्लाते हुए एक ठे छे दिहा हो कल्लू तोहार चेलवा बड़ा सुस्त हौ। कल्लू चचा अपने बात में रमे थे तो काहे उठने जाय,बोले रुका अबै ताजी चाय बनावत हई,त पिआयिला आवा तब ले हाल चाल हो जाय। रामनाम गुरु जजमानी से आ रहे थे दिमाग गरम था।कहे इ तू लोग संकेतिक तपस्या के चक्कर में कहा से पड़ी गैला जा ,अरे यार इ कुल पैसा क खेल हौ,कहो अबैहन कुछ दिन पहिलवा जब अन्ना क आन्दोलन रहल त दबे मुह सब लोग हिसाब देत रहलन की एतना न एतना पैसा खर्च हो गईल अन्ना के आन्दोलन में इ बाजारू हौ,अब इ संत लोग सैकड़ो गाड़ी लेके दिल्ली से दौलताबाद हजारन लोगन के साथे दौरत हुवे का फ़ोकट में, अब केहू सास ना लेट हव,बडवार संत हवे भाई ।इनसे के विरोध ली ।मैंने कहा नाही बाबा ऐसी बात नाही हाई वो लोग साफ सुथरा संघर्ष कर रहे हैं। गुरुआ फायर संघर्ष नाही ख़ाक करत हवे लोग इ कुल खाली पुरनके गंगा परेमी के पते पर लात मारे क साजिस हौ ,और कुछ नाही,तू माना त ठीक नाही तू अपने घरे हम अपने घरे। कहो गंगा पर वो लोगन के खुश करे खातिर परधानमंत्री किहाँ से पैसा चाल देहले बा,बड़का बाबा बोलिहैं त उपर बैठल देवीजी काप जेहन।
देखा न अब तक गंगा गंगा जहाँ पिसवा आ जाई ,फिर बंद। कहो गंगा ब्रह्माण्ड क नदी बा,ओके राष्ट्रीय बनावे खातिर इ लोग लदत रहलन ,समझ में नाही आवत हौ की गंगा क कद छोट करे खातिर इ लोग काहे एतना परेशां रहलन। अब देख इ लोग असी और वरुण भी बचावे आवत हवे नदी के नाम पर लुतिहैन खाली लोग मरदवा ,,हे तोहार चाय आई कल्लू की हम चली ,तब तक कल्लू चचा क चेलवा चाय लेकर हाजिर ,लीजिये चाय पीजिये। हम कहे गुरूजी रहेला तू डोभी बनारस के बारे में एतना कैसे जानत हौवा। गुरु कहे और सुना बताई ,हम उनके परोसे रहत रहली ,जब गंगा किनारे क मकान टूटत रहल त जानत हवा सबसे पाहिले बाबा के मथ्वे में ताला लटकल रहल । लेकिन ये भैया चला चली छोटवार मुह बडवार बात,हमार के मानी,,,,,,कब ले रहे के हौ हो ,हम कहे बस शाम को निकल जायेंगे बाबा,,,तब तक कल्लू चचा से नाही रह गयल कहे चला अगली बार आवा त हमने गुरु के गेरुआ पहेना के इनसे मेह्नाजपुर के पजर्वे वाली गांगी नदी खातिर आन्दोलन कायल जाई ,जब सब कुछ संकेतिक करे के बा त दुकान के साथै वुहो चली ,,,कुछ एबे करी जाई का ,कम से कम फोटो त निकलबे करी।

बुधवार, 6 जून 2012

जैस लाल चाउर वोइसे दतनिपोर गहकी

बड़े दिनों बाद दो दिन पहले गंगा घाट पर अडीयाने का मौका मिला,कुछ पुराने अक्खरियों के साथ। पुराने सहपाठी साथी सुशील जी जो आजकल एक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं बनारस पधारे थे । शुरू हुआ बतकुच्चन का दौर। चाय वाला भी पूरे रँव में था । बोला, का गुरु लोग कहाँ रहला लोग, एतना दिन बाद शकल देखावत बाड़ा जा । का देईं ,लीकर या उजरकी । साथ में खड़े पांडे जी बोल उठे उजरकी करियाई दोनों एक्के में मिला के दा। चाय वाला भी अपने ज़माने क अक्खड़ समाज वादी ठहरल, कहा उप्पर से मलइयो मार देईं । तब तक सुशील जी चिल्लाये धूम्र दंडिका भी लियावा। चाय वाले साथी फिर शुरू वाह गुरु दिल्ली वाला हो गैला त शवेत हटा देहला। इ लइकवा कुल बड़का शहरी बन जालन त इहे होला इ स शब्दवे खाए लागैलन । मैं बड़ी हिम्मत जुटा कर बोला जैसे ,मेरी भी लगभग क्लास लग गयी ,तू अंग्रेजी वाला हुवा न तोही लोगन त ढेर नाश कैले बड़ा जा। कहना शुरू ,एगो हमार लिका बा विश्वनाथ मंदिर के वी टी कहला ,एगो कम्पूटर किनले हाउ ओके लेपि लेपि चिल्ला ला त छोटका कुकुरा जो पल्ले हई ,उ आ जाला ,ओकर कौन दोष बेचारे क । जैस लाल चाउर वैस दत निपोर गहकी।

बुधवार, 30 मई 2012

का गंगो होइंहे गांगी

बहुत दिन बाद गाँव से मेरे पुरोहित रामनाम गुरु का फोन आया। काहो कहाँ बाड़ा ?मरदवा गुलरी क फूल भ गिल हवा,आज कल कुछ अत -पता नाही चालत हव। रामनाम गुरु बिना आशीष दिए चालू थे। अउर बतावा तोहरे बनारस क का हाल हवे ,,आज काल त जेहर देखा वोहर खाली गंगे गंगा होत हव । बड़ी मुश्किल से गुरु हाँ कहने का मौका दिए। पूछाकू अंदाज में बोले तोहू सुनली अलगे राग अलपले हौया , इ असी कौन नदी बा हो जेके बचावे खातिर तू बौरायल बाडया। किसी तरह से बोलनका अवसर दिए मै कहा आपको कहाँ से पता चला गुरूजी। गुरु फिर नॉन स्टॉप चालू,अरे आजकल एक थे नन्हका अख़बार आवत हाउ कोम्पैक्ट उहे में कई दिन तोहर नाँव देखली त कई दिन से सोचत रहली की तोहसे पूछी की इ असी कौन नदी पैदा कई देहला। मैं कहा नहीं गुरु मैंने नहीं पैदा किया इसे यह वही नदी है जिसने इस शहर को वाराणसी नाम दिया वरुणा अउर असी दो वाराणसी की पुरानी सांस्कृतिक नदी है। फिर शुरू हुए इ हौ कहाँ हो,मैं कहा संकटमोचन के पास नहीं देखे हैं। उ बोले कहो उ नलवा क बात करत हवा का,हम कहे हाँ ...अच्छा अच्छा त उहे नदी बा एकरे किनारा ले त मकान बनल बटे केसे केसे लड़बा ,,चला खैर तोहार लड़ाई ठीक बा लेकिन इ बाबा लोगन क चक्कर समझ से परे बा ,कहो अबहीं गंगा रोज लोगन के मुआवत हौ ,बरसात में त बाबा के मठो में पानी घुसुर जाला गंगा केहुके बिगराले और बचवले मान का हीन उ देवी हैं देवी ,इ कुल नाटक बा ,,तू लागल रहा अगर इ नदी असी बची त शहर बची नाही त यही तरे गंगो गांगी हो जैहे ,इ लोग संख बजावत रह जेहन..............

का गंगो होइंहे गांगी