बुधवार, 30 मई 2012

का गंगो होइंहे गांगी

बहुत दिन बाद गाँव से मेरे पुरोहित रामनाम गुरु का फोन आया। काहो कहाँ बाड़ा ?मरदवा गुलरी क फूल भ गिल हवा,आज कल कुछ अत -पता नाही चालत हव। रामनाम गुरु बिना आशीष दिए चालू थे। अउर बतावा तोहरे बनारस क का हाल हवे ,,आज काल त जेहर देखा वोहर खाली गंगे गंगा होत हव । बड़ी मुश्किल से गुरु हाँ कहने का मौका दिए। पूछाकू अंदाज में बोले तोहू सुनली अलगे राग अलपले हौया , इ असी कौन नदी बा हो जेके बचावे खातिर तू बौरायल बाडया। किसी तरह से बोलनका अवसर दिए मै कहा आपको कहाँ से पता चला गुरूजी। गुरु फिर नॉन स्टॉप चालू,अरे आजकल एक थे नन्हका अख़बार आवत हाउ कोम्पैक्ट उहे में कई दिन तोहर नाँव देखली त कई दिन से सोचत रहली की तोहसे पूछी की इ असी कौन नदी पैदा कई देहला। मैं कहा नहीं गुरु मैंने नहीं पैदा किया इसे यह वही नदी है जिसने इस शहर को वाराणसी नाम दिया वरुणा अउर असी दो वाराणसी की पुरानी सांस्कृतिक नदी है। फिर शुरू हुए इ हौ कहाँ हो,मैं कहा संकटमोचन के पास नहीं देखे हैं। उ बोले कहो उ नलवा क बात करत हवा का,हम कहे हाँ ...अच्छा अच्छा त उहे नदी बा एकरे किनारा ले त मकान बनल बटे केसे केसे लड़बा ,,चला खैर तोहार लड़ाई ठीक बा लेकिन इ बाबा लोगन क चक्कर समझ से परे बा ,कहो अबहीं गंगा रोज लोगन के मुआवत हौ ,बरसात में त बाबा के मठो में पानी घुसुर जाला गंगा केहुके बिगराले और बचवले मान का हीन उ देवी हैं देवी ,इ कुल नाटक बा ,,तू लागल रहा अगर इ नदी असी बची त शहर बची नाही त यही तरे गंगो गांगी हो जैहे ,इ लोग संख बजावत रह जेहन..............

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