सच मानिए बात थोड़ी बिचित्र है लेकिन लगभग सचित्र है । कही एक तस्वीर अभी थोड़ी देर पहले देखा जिसमे उत्तराखंड में सैकड़ों महिलायें एक साथ बैठ कर कही कोई आटा गूथ रहा था तो कही कोई सब्जी बनाने में लगा हुआ था ,पुरुष वर्ग खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी लिए था ,,एकाक्क बच्चे भी भूले भटके से तस्वीर में दिखे जिन्हें अंगुली पकड़ कर खाने की तरफ शायद बुलाया जा रहा था,वो भी एक दम खुले आसमान के नीचे । यूं तो सच में तस्वीर एक ही थी पर न जाने कितने भाव वो भर गयी । एक बात तत्काल दिमाग में कौधी की काश ऐसे हम हमेशा होते ,,,प्रकृति ने हमें समूची धरती और ,,समूचा आसमान दिया ,,बाग़ बगीचे दिए ,,नदी पहाड़ ,झरने दिए ,,ताल तलैया ,और न जाने क्या क्या दिया ,,,और हम है की एक चहारदीवारी और उसकी छत को सिर्फ अपना बनाने के लिए मरे जा रहे हैं ,सबको छले जा रहे हैं । वहां सब दुसरे का पेट भरने को आतुर दिख रहे थे ,,कहीं कोई स्वार्थ नहीं ,कहीं कोई अपना नहीं न कहीं कोई पराया । सच मानिए कहने में डर तो लग रहा है लेकिन अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ ,,,अगर ये तबाही इतना कुछ सिखाती है तो इसकी जरुरत है ।
बुधवार, 26 जून 2013
शनिवार, 22 जून 2013
मंगरू पहलवान एक थैली में चार पांच दशहरी आम लिए , थके हारे कही से घुमते हुए जंगली की पान दूकान पर पहुचे ही थे कि रामनाम गुरु टोके ,,का मंगरू कहाँ से आवत हौवा ,,आजकल त तोहार सरकार हौ अब कहे त्रस्त लगत बाड़ा । ,,,मंगरू हाफ्ते हुए चापे ,,का सबेरे सबेरे मेघा के तरह टरटराये लागला रामनाम ,,,तोहइ उहे रे जिम्मे कवनो काम धाम न हाउ का ,,,,,तब ले पीछे से रोज राजनैतिक सुन परिपक्क अंदाज में ,,,जंगली बोले ये रामनाम गुरु ,,अब तोहार बात कुल ख़ारिज हो गईल ,,,रामनाम इससे पहले की पूछते कौन बात,,,, मंगरू ही टपक पड़े ,,,कऊ वन बात हो ,,,उहे अब तोहार पार्टी अपने उप्पर से परिवारवाद क मोहर हटा देहलस ,,,जब अखिलेश अपने मौसा के ही निकरवा देहलन ,,,जंगली बोले ,,,मंगरू कवन मौसा हो,,अरे प्रमोद गुप्ता औरैया के बिधूना से विधायक ,,,,,तब ले मंगरू क थैला फाटल कुल दशहरी चित्राय गयल ,,,,,का ,,,,,,
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