सुबहे सुबह कल्लू मियां अपने चेलवा पे गरम थे ,साला पढ़ल न लिखल घर जवंपुर। तू जवंपुर क होई नाही सकते,एतना बडवार मूरख इहाँ जनमी न सकत ,साला एक त करेला ऊपर से नीम चढ़ल। तब तक पुरवा खाली करते हुए एक ग्राहक बड़ी हिम्मत जुटाते हुए पूछा चचा इ करेला नीम चढ़ल से एकर का मतलब ,,चचा शुरू इ डोभी हौ एकर आपन इतिहास हौ,इहा खाली बुद्धिमान रहेलन ,इ मूरख लईका कहा से सपर पाई इ माहोल में ,जवंपुरी समझ के रखले रहली लेकिन इ हव ना। तब तक कल्लू मियां की दिव्य दृष्टि मेरे ऊपर पड़ती है,का हो जवंपुरिया बनारसी कब शरीर आईल ह। मै बोला चचा बस आपके यहाँ ही चरण पड़ रहा है।अरे त बतावा आजकल अख़बार में बनारस वाले पेज पर खाली गेरुआ ही छौले बा हो। चचा शुरू कहो इ तपस्या त सुनले रहली इ ससुरी संकेतिक तपस्या कवन नयी बला इजाद कैलन बाबा लोग। हम कहे चचा वह गंगा अभियान पर संत लोग लड़ाई लड़ रहे हैं,सबके अपने अपने तौर तरीके हैं। तब तक पीछे से पगरी खोलते रामनाम गुरु साइकिल से उतरे चिल्लाते हुए एक ठे छे दिहा हो कल्लू तोहार चेलवा बड़ा सुस्त हौ। कल्लू चचा अपने बात में रमे थे तो काहे उठने जाय,बोले रुका अबै ताजी चाय बनावत हई,त पिआयिला आवा तब ले हाल चाल हो जाय। रामनाम गुरु जजमानी से आ रहे थे दिमाग गरम था।कहे इ तू लोग संकेतिक तपस्या के चक्कर में कहा से पड़ी गैला जा ,अरे यार इ कुल पैसा क खेल हौ,कहो अबैहन कुछ दिन पहिलवा जब अन्ना क आन्दोलन रहल त दबे मुह सब लोग हिसाब देत रहलन की एतना न एतना पैसा खर्च हो गईल अन्ना के आन्दोलन में इ बाजारू हौ,अब इ संत लोग सैकड़ो गाड़ी लेके दिल्ली से दौलताबाद हजारन लोगन के साथे दौरत हुवे का फ़ोकट में, अब केहू सास ना लेट हव,बडवार संत हवे भाई ।इनसे के विरोध ली ।मैंने कहा नाही बाबा ऐसी बात नाही हाई वो लोग साफ सुथरा संघर्ष कर रहे हैं। गुरुआ फायर संघर्ष नाही ख़ाक करत हवे लोग इ कुल खाली पुरनके गंगा परेमी के पते पर लात मारे क साजिस हौ ,और कुछ नाही,तू माना त ठीक नाही तू अपने घरे हम अपने घरे। कहो गंगा पर वो लोगन के खुश करे खातिर परधानमंत्री किहाँ से पैसा चाल देहले बा,बड़का बाबा बोलिहैं त उपर बैठल देवीजी काप जेहन।
देखा न अब तक गंगा गंगा जहाँ पिसवा आ जाई ,फिर बंद। कहो गंगा ब्रह्माण्ड क नदी बा,ओके राष्ट्रीय बनावे खातिर इ लोग लदत रहलन ,समझ में नाही आवत हौ की गंगा क कद छोट करे खातिर इ लोग काहे एतना परेशां रहलन। अब देख इ लोग असी और वरुण भी बचावे आवत हवे नदी के नाम पर लुतिहैन खाली लोग मरदवा ,,हे तोहार चाय आई कल्लू की हम चली ,तब तक कल्लू चचा क चेलवा चाय लेकर हाजिर ,लीजिये चाय पीजिये। हम कहे गुरूजी रहेला तू डोभी बनारस के बारे में एतना कैसे जानत हौवा। गुरु कहे और सुना बताई ,हम उनके परोसे रहत रहली ,जब गंगा किनारे क मकान टूटत रहल त जानत हवा सबसे पाहिले बाबा के मथ्वे में ताला लटकल रहल । लेकिन ये भैया चला चली छोटवार मुह बडवार बात,हमार के मानी,,,,,,कब ले रहे के हौ हो ,हम कहे बस शाम को निकल जायेंगे बाबा,,,तब तक कल्लू चचा से नाही रह गयल कहे चला अगली बार आवा त हमने गुरु के गेरुआ पहेना के इनसे मेह्नाजपुर के पजर्वे वाली गांगी नदी खातिर आन्दोलन कायल जाई ,जब सब कुछ संकेतिक करे के बा त दुकान के साथै वुहो चली ,,,कुछ एबे करी जाई का ,कम से कम फोटो त निकलबे करी।
गुरुवार, 28 जून 2012
बुधवार, 6 जून 2012
जैस लाल चाउर वोइसे दतनिपोर गहकी
बड़े दिनों बाद दो दिन पहले गंगा घाट पर अडीयाने का मौका मिला,कुछ पुराने अक्खरियों के साथ। पुराने सहपाठी साथी सुशील जी जो आजकल एक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं बनारस पधारे थे । शुरू हुआ बतकुच्चन का दौर। चाय वाला भी पूरे रँव में था । बोला, का गुरु लोग कहाँ रहला लोग, एतना दिन बाद शकल देखावत बाड़ा जा । का देईं ,लीकर या उजरकी । साथ में खड़े पांडे जी बोल उठे उजरकी करियाई दोनों एक्के में मिला के दा। चाय वाला भी अपने ज़माने क अक्खड़ समाज वादी ठहरल, कहा उप्पर से मलइयो मार देईं । तब तक सुशील जी चिल्लाये धूम्र दंडिका भी लियावा। चाय वाले साथी फिर शुरू वाह गुरु दिल्ली वाला हो गैला त शवेत हटा देहला। इ लइकवा कुल बड़का शहरी बन जालन त इहे होला इ स शब्दवे खाए लागैलन । मैं बड़ी हिम्मत जुटा कर बोला जैसे ,मेरी भी लगभग क्लास लग गयी ,तू अंग्रेजी वाला हुवा न तोही लोगन त ढेर नाश कैले बड़ा जा। कहना शुरू ,एगो हमार लिका बा विश्वनाथ मंदिर के वी टी कहला ,एगो कम्पूटर किनले हाउ ओके लेपि लेपि चिल्ला ला त छोटका कुकुरा जो पल्ले हई ,उ आ जाला ,ओकर कौन दोष बेचारे क । जैस लाल चाउर वैस दत निपोर गहकी।
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